सत्य
सत्य अर्थात क्या ?
क्या परिभाषा दी जाए इसकी, मेरी समझ से जो जैसा है, उसे वैसा ही स्वीकार करना । यही सत्य है
वैसे अटल जी के शब्दों में -
जो है उसका होना सत्य है,
जो नहीं है, उसका न होना सत्य है ।
होना, न होना, सत्य के दो आयाम
शेष समझ का फेर और बुद्धि के व्यायाम ।
पिछले दिनों हमारे शहर में एक जादूगर आये थे और पहले भी वे आते रहे हैं, जाहिर है जादूगर हैं तो जादू करते होंगे यही सोचकर कई मर्तबा उनका ये कार्यक्रम मैंने देखा है। उनके हाथों की सफाई ऐसी रहती है कि सामने जो हो रहा है उसे सत्य मानना पड़ता है परन्तु सत्य यही है कि उन हाथों की चतुराई सत्य का भ्रम पैदा करती है जबकि वस्तुस्थिति वैसी होती नहीं है ।
पाठक अब तक मेरी इस बात से सहमत हैं मगर मैं इसे जब आज की राजनीति के परिप्रेक्ष में कहने का प्रयास भर करूंगा तो कईयों की भोंहे तन जायेंगी ।
पूर्वाग्रह से सज्ज ये लोग सुधार नहीं चाहते केवल अनुकरण चाहते हैं, अन्धानुकरण और आज तक यही होता आया है । तीन घंटे का शो, ढेरों तालियाँ और फिर खाली कुर्सियां, खाली जेब, खाली-खाली मन फिर उसी आनंद की अनुभूति के लिए फिर कोई और शो देखना पड़ता है ।
इस प्रकार सदियों पुराना भारतवर्ष पुस्तकों में विश्वगुरु अवश्य रहेगा और हम गौरवान्वित भी होते रहेंगे मगर धरातल पर इसे चरितार्थ करने के लिए हमें सत्य की आवश्यकता है । सत्य कर्म-सत्य वचन की ...
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