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Showing posts from May, 2015

ज़ोर

गले की मालिश तबसे जोरों पर है ! जब से सुना, हमारा नाम उनकी उँगलियों के पेरवों पर है !!

स्वरूचि भोज

कोरे कागज़ पर, फकत रोटी ही लिख दो ! मगर कतारों में, 'स्वरुचि भोज' बक्श दो !

आशिक

जिंदगी दो होती, एक तुझ पे लुटा देता ! एक तो गुजर जाएगी महज, रोटी के बंदोबस्त में !! - बेरोजगार आशिक '1998'

Insaan

कितनी स्याही उड़ेल दी कागजों पर, मगर कुछ न बदला .... इंसान तू शैतान ही बनते चला गया ।। तिनका-तिनका बिखेरता घोंसले का, हैसियतों के तू , ये क्या ख्वाब बुनते चला गया ।। कुदरत की ताक़त क...

ग़म

क्या होता यारों ग़र महफ़िल हमें मिल जाती ? ग़म ग़मगीन हो जाता, तन्हाई तन्हा रह जाती ।

यादें

सूख चुके हैं अश्क, भ्रम था ! जम गए थे शायद, फरेबों के तले !! साफ़ देख पाता हूँ सब ! यादों की तपिश में बरस गया जो धुंधलका सा था ।