चश्मा

बाजार से चन्द खुशियाँ ...
खरीद लाया हूँ,
प्लास्टिक की शक्ल में हैं कुछ,
कुछ सोने की सूरत में हैं ।
बीवी खुश है, बच्चे खुश
तो मैं भी खुश क्यूं न हूँ ?
एक चश्मा ले आया हूँ,
कुछ दवाएं भी ।

अब और टुकडे बटोरूंगा,
कागज़ के ..
ये टुकड़े सबको खुशियाँ बांटते हैं ।।

माँ-बाप ने कुछ नहीं माँगा,
उनसे भी कुछ पूछा मैंने,
कांपते हाथ,
बस यही कह रहे थे,
बेटा हमें बस तुम्हारी ख़ुशी चाहिए !
ह ह ह !!!
वो तो मैं चश्मा ले ही आया हूँ
आधुनिकता का  !!!

Comments

Popular posts from this blog

वसुंधरा जी !

Daud