दवाई

इस सत्यता के कोई प्रमाण मेरे पास उपलब्ध नहीं हैं कि उनसे मेरी क्या बात हुई ? मगर मेरा पक्ष ये है कि मैंने उनका नंबर मिलाया और उनके मोबाइल पिक करते ही यह कहा कि "साहेब नमस्कार"

जवाब - "बोलिये"

मैंने कहा - "जी ! विमल पूनियां बोल रहा हूँ .....
जवाब - "हाँ तो ? "
"साहब ! ये चिकनगुनिया, डेंगू का क्या चल रहा है ?"

मैंने इस अपेक्षा के साथ पूछा कि साहब की तो रातों की नींद हराम होगी, इस विषय को लेकर तो बोलते ही समझ जाएंगे !

जवाब - "रात को 9.30 बजे ये पूछने वाले आप कौन होते हैं ? "

मैं (परमत्मा स्वरुप) - "जी ! चारों तरफ इस बीमारी के विषय में सुन-सुनकर हैरान हूँ !"

जवाब - " तो अखबार पढो, नेट पर देखो, मैं यहाँ जवाब देता रहूंगा क्या ?"

मैंने बड़ी कुटिल शब्दों की रचना की और सिर्फ यही कहा - " साहब ! सबको अखबार कहाँ पढ़ना आता है ? और नेट चलाने वाले तो अँगुलियों पर हैं ! मुझे ये सब नहीं आता ।"

जवाब -" किस हैसियत से ये जवाब मांग रहे हो मुझसे इस वक़्त ? "

मैंने (परमात्मा स्वरूप देह) ने ह्रदय को कड़ा करते हुए ये जवाब दाग दिया - " आजाद हिंदुस्तान के एक नागरिक की हैसियत से "

जवाब - " विमल जी ! आप पढ़े लिखे इंसान हो इसलिए  आपका फोन उठा लिया, वरना मैं Festival time में किसीका फोन नहीं उठाता, सुबह बात करना "

मैं असहाय यही बोला -  " किसीके जीवन पर ही बन आए तो कैसा पर्व ? "

जवाब - "सुबह बात करना ।।।। ठीक 11 बजे "

क्या करूं ??

Comments

Popular posts from this blog

वसुंधरा जी !

Daud