बस्ती
कहने को मैं इंसानी बस्ती में रहता हूँ
मगर
हवा दुषित, पानी गंधला, जेबें फूंकती आग,
सिकुड़ती जमीं और घुटता आसमां !
फिर जीने को क्या है ?
फरेब, धोखे, लालच, अहम्, स्वार्थ,
ईर्ष्या और हवस अब जानने को क्या है ?
पाना भी यही और खोना भी यही,
फिर जिंदगी अब समझाने को क्या है ??
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