एक शराबी अपनी रोज पीने की लत पर - "क्या साथ जाएगा" बीवी-बच्चे - "यूं छोड़ कर भी क्या जाने वाले हो" ??? @#$%^** -विचारणीय
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Showing posts from January, 2020
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तुम्हारी राजनीति कहती है कि देश या व्यवस्था के लिए मर मिट जाओ, समाज कहता है कि समूह का हिस्सा बने रहने के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दो,अर्थव्यवस्था कहती है कि पैसे कमाने के लिए अपनी जिंदगी दाँव पर लगा दो, धर्म कहता है कि अपने-अपने भगवानों के नाम पर खुद को कुर्बान कर दो, सभ्यता कहती है कि अपनी अलग पहचान के लिए मरने मारने पर उतारू रहो, नैतिकता कहती है कि सत्य को बचाने के लिए अपना वजूद खत्म कर दो | ये ही वो मकसद हैं,जो तुम इन्सानों के लिए तय किये गये हैं | तुमने अपनी नंगी आंखों से कभी किसी राष्ट्र, समाज, धर्म, सभ्यता,नैतिकता या अर्थव्यवस्था को न देखा है और न ही पूरी तरह से समझा है | फिर भी तुमने इनके मकसदों को ओढ लिया और हजारों सालों से इन्हें पूरा करने के लिए खुद को मारते रहे, दूसरे इन्सानों को मारते रहे,दूसरे जीवों को मारते रहे, कुदरत को नुकसान पहुँचाते रहे | मैं तुम्हारी इन हरकतो को वाजिब मान लेता,अगर तुम सारे इंसान इस पूरी कवायद के बाद खुद को एक देश, एक समाज, एक सभ्यता,एक धर्म, एक अर्थव्यवस्था या एक नैतिक मूल्य की छतरी के नीचे इकट्ठा कर पाते | पर तुम्हारी जिन्दगी तो दिमागीतन्त...
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'अकेलापन' इस संसार में सबसे बड़ी सज़ा है.! और 'एकांत' इस संसार में सबसे बड़ा वरदान.!! ये दो समानार्थी दिखने वाले शब्दों के अर्थ में . आकाश पाताल का अंतर है। अकेलेपन में छटपटाहट है तो एकांत में आराम है। अकेलेपन में घबराहट है तो एकांत में शांति। जब तक हमारी नज़र बाहरकी ओर है तब तक हम. अकेलापन महसूस करते हैं ...
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● अहंकार विसर्जन है भक्ति ● प्रेम का मार्ग मस्ती का मार्ग है। होश का नहीं, बेहोशी का। खुदी का नहीं, बेखुदी का। जागरूकता का नहीं, तन्मयता का। यद्यपि प्रेम की जो बेहोशी है उसके अन्तरगृह में होश का दीया जलता है। लेकिन उस होश के दीए के लिए कोई आयोजन नहीं करना होता। वह तो प्रेम का सहज प्रकाश है, आयोजन नहीं। यद्यपि प्रेम के मार्ग पर जो बेखुदी है, उसमें खुदी तो नहीं होती, पर खुदा जरूर होता है। छोटा मैं तो मर जाता है, विराट मैं पैदा होता है। और जिसके जीवन में विराट मैं पैदा हो जाए, वह छोटे को पकड़े क्यों ? वह छुद्र का सहारा क्यों ले ? जो परमात्मा में डूबने का मजा ले ले, वह अहंकार के तिनकों को पकड़े क्यों, बचने की चेष्टा क्यों करे ? अहंकार बचने की चेष्टा का नाम है। निर - अहंकार अपने को खो देने की कला है। भक्ति विसर्जन है, खोने की कला है। और खूब मस्ती आती है भक्ति से। जितना मिटता है भक्त, उतनी ही प्याली भरती है। जितना भक्त खाली होता है, उतना ही भगवान से भरपूर होने लगता है। भक्त खोकर कुछ खोता नहीं, भक्त खोकर पाता है। अभागे तो वे हैं जिन्हें भक्ति का स्वाद न लगा, क्योंकि वे कमा - कमाकर केवल ...
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ओशो व्याख्या - हम लड़ लेते हैं, झगड़ लेते हैं, गाली—गलौज कर लेते हैं, दोस्ती—दुश्मनी कर लेते हैं, अपना—पराया कर लेते हैं, मैं-तू की बड़ी झंझटें खड़ी कर देते हैं। अदालतों में मुकदमेबाजी हो जाती है, सिर खुल जाते हैं। अगर हम मृत्यु को ठीक से पहचान लें, तो इस पृथ्वी पर वैर का कारण न रह जाए। जहां से चले जाना है, वहां वैर क्या करना? जहां से चले जाना है, वहां दो घड़ी का प्रेम ही कर लें। जहां से विदा ही हो जाना है, वहां गीत क्यों न गा लें, गाली क्यों बकें? जिनसे छूट ही जाना होगा सदा को, उनके और अपने बीच दुर्भाव क्यों पैदा करें? कांटे क्यों बोएं? थोड़े फूल उगा लें, थोड़ा उत्सव मना लें, थोड़े दीए जला लें! इसी को मैं धर्म कहता हूं। जिस व्यक्ति के जीवन में यह स्मरण आ जाता है कि मृत्यु सब छीन ही लेगी; यह दो घड़ी का जीवन, इसको उत्सव में क्यों न रूपांतरित करें! इस दो घड़ी के जीवन को प्रार्थना क्यों न बनाएं! पूजन क्यों न बनाएं! झुक क्यों न जाएं—कृतज्ञता में, धन्यवाद में, आभार में! नाचें क्यों न, एक—दूसरे के गले में बांहें क्यों न डाल लें! मिट्टी मिट्टी में मिल जाएगी। यह जो क्षण—भर मिला है हमें, इस क्षण—भ...
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अधिवक्ता / एडवोकेट / वकील ये सब एक ही है। अधिवक्ता वैदिक शब्द है। शुक्लयजुर्वेद में भगवान् शिवको प्रथम अधिवक्ता कहा गया गया है- "अद्ध्यवोचदधिवक्ताप्प्रथमोदैव्योभिषक्"। एडवोकेट शब्द लैटिन में १४वी शताब्दी में प्रचलन में आया, वकील मुग़ल काल में। भारत में एडवोकेट्स एक्ट १९६१ पारित होने के बाद क़ानून का व्यवसाय करने लिए बार काउन्सिल में पंजीकृत सभी व्यक्तियों को एडवोकेट कहा जाने लगा जिसका हिन्दी अनुवाद अधिवक्ता है। और संसार में केवल अधिवक्ता ही हैं जिन्हें विद्वान की उपाधि दी गई है।
आपबीती
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तर्कों और कुतर्कों के बीच आखिर मेरा देश बदल तो रहा ही है, देश यूं तो हजारों साल का है और संस्कृति अनादिकाल से है मगर बेड़ियों से मुक्त हुए मेरे भारत को 70 साल हुए हैं इस लिहाज से बूढ़ा कहूँ कि युवा ? आज तक नहीं समझ पाया मगर 38 के हो गए हैं हम 39 के रास्ते में हैं, किसी विश्लेषणकर्ता ने बताया सबसे युवा देश भारत है तो हम अपनी सी उम्र का मान लेते हैं। राजनीति कभी अपने रूचि का विषय नहीं रहा सो विज्ञानं और गणित में उलझ गए कभी π और अल्फ़ा बीटा गामा समझ नहीं आया रट्टा लगाकर 12 पास किया तो मन में बैचेनी सी रहती थी कि साला लानत है अपनी जिंदगी, में भी ठगी हो गई अरुचि के पहुंचे फिर गच्चा खा गए अब किस्मत से एक गलती हो गई स्नातक के आवेदन भी भरने न आए तो मजबूरन हिन्दी से पूरी भेंट हो गई और दिल लगा बैठे सो हमारी नैया पार हुई । राजनैतिक परिवार से हैं तो रोज सरकारी मुलाजिमों को हाथ में एक कागज़ लिए देखते आए हैं, न मालूम करने पर भी पता चल जाता था कि ये स्थानांतरण की अर्जी है, देख-देखकर ही उकता गए ठान लिया सरकारी तो बिल्कुल नहीं
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मालिक चमचमाती धूप और दमघोटू ऊमस में, थोड़ी सी रोशनी की बहुत अधिक कीमत लिए, कतारों में खड़ा है !! उधर बेशर्म मुनीम कुर्सी पर बैठा, खैनी पर जीभ लपलपाता चिल्लर न होने के बहाने, दो-पांच अनकही भीख लेता हुआ, पंखे-कूलर में अंगड़ाई भर रहा है .... देखो मेरे देश का अजब लोकतंत्र ----- लोक लुट रहा है और तंत्र लूट रहा है ......
गाँधी को किसने मारा ?
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गाँधी को किसने मारा ? इस प्रश्न को उस अर्थ में न लिया जाए, जिस अर्थ में अक़्सर लिया जाता रहा है। मैं दैहिक हत्या की बात नहीं कर रहा, मैं नश्वर शरीर के मिट जाने की बात नहीं कर रहा । वो तो मिटना ही था, उस दिन नहीं तो किसी और दिन, सभी गए हैं, सभी जाएंगे । गॉडसे तो निमित्त मात्र था । हम बड़ी भूल कर रहे हैं, दैहिक नश्वरता को मृत्यु मान बैठे हैं, यदि ऐसा होता तो प्रत्येक शरीर की बड़ी चर्चाएं होती जैसी विद्वानों के जाने की होती हैं परन्तु ऐसा नहीं है। तो मरता कौन है, मृत्यु किसकी होती है, मारता कौन है ? शरीर के चले जाने के बाद क्या बच जाता है, जो सदैव जीवित रहता है, मैं यहाँ आध्यात्मिक नहीं हो रहा हूँ एकदम यथार्थ । कोई आत्मा की बात नहीं करता, जीवित रहने वाली उस चीज का नाम, जो अविनाशी है वो हैं उस शरीर के मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाले विचार । मैं यह कह दूं कि मैं राम हूँ तो कदाचित् न चलेगा, इसलिए नहीं कि मैंने शरीर धारण नहीं किया हुआ, वो तो है, न हो तो उन जैसी कद काठी न होगी, शक्ल न होगी, रूप न होगा, सौंदर्य न होगा बल्कि इसलिए कि राम के मस्तिष्क में उत्पन्न विचार इस धरा पर सर्वश्रेष्ठ थे, ...
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हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए ! आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी, शर्त थी लेकिन कि यह बुनियाद हिलनी चाहिए ! हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गांव में हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए ! सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए !! मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।
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बाज़ सदृश भ्रष्टाचार, बैठा जो पंख पसार ! अब न बचेगा, जागा है सूचना का अधिकार !! सोने की चिड़िया बहुत नोंच खाई तूने, गौर से सुन अब ये ललकार ! अर्जुन का गांडिव है ये, कृष्ण का है सुदर्शन खाली न जाएगा इसका वार !! निकम्मों, भ्रष्टाचरियों में मची है हाहाकार ऐसा है धारदार ये सूचना का अधिकार !! भीष्म शपथ है भारतपुत्रों की, चहूँ ओर खुशहाली लाएंगे ! चहक उठेगी फिर सोने की चिड़िया, वो दिन फिर शीघ्र ही आएंगे !! कुछ सितम और सही करले जालिम कुछ और अत्याचार ! जन-जन तक पहुँच जाए बस सूचना का अधिकार ! करो लेटलतीफी का प्रतिकार, उठाओ आवाज सूचना का अधिकार !!!
चुनावी जुगलबंदी
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सियासत, चुनाव और ठण्ड की तुकबंदी या कहें जुगलबंदी : जाडो पड़ै है जाडो, सारा सोड़-गुदडिया काडो । ई बखत म ये चुनाव रासो होग्यो ठाडो ।। डी डी सी, बी डी सी , सरपंच अर बीच म पञ्च की पाचर । कठे झोली भर-भर बोट मिलै, कठे जवाब मिले कोणी द्यां पाचर ।। दारूड़ियाँ क मोज आगी, चुनाव लड़निया रोवै धर-धर पटपड़ि पर हाथ ! इब के करां या मांगत तो रोज आगी !!
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इंकलाब जिंदाबाद दोस्तों राजनीति केवल सक्षम और सामर्थ्यवान जनता के लिए सुविधाएं जुटाने का काम करती है इससे अलग जो वर्ग है उसको भीख देकर तुष्टीकरण का नाटक करती है ! छोटी सी उदाहरण के तौर पर मैं कहूं तो जैसे सरकारी कर्मचारी हैं आप देखते होंगे की नेता लोग अक्सर उनके तबादलों की माथापच्ची में ही लगे रहते हैं दूसरा थाने कचहरी में लड़ने वाले लोगों के लिए किसी एक पक्ष का पक्षधर बनकर खड़े होना और भूमाफियाओं शराब माफियाओं या फिर अनर्गल व्यापार करने वाले लोगों का साथ कोई ना कोई पार्टी या कोई ना कोई नेता जरूर देता है परंतु जहां आमजन के विकास उसकी सुविधाओं की बात आती है तो कोई एक योजना लागू कर दी जाती है और जिस में नियमों का जाल बिछा दिया जाता है जिस आदमी को सुविधाएं मिलनी है वह अनपढ़ है सिस्टम से अनजान है और उस की आड़ में भी यही उच्च वर्ग चाहे वह राजनीतिक हो और चाहे वह प्रशासनिक सिस्टम हो वह कहीं ना कहीं अपने हित साधता है और इनको सुविधाओं के नाम पर अपने वोट बैंक में तब्दील करता है