तुम्हारी राजनीति कहती है कि देश या व्यवस्था के लिए मर मिट जाओ, समाज कहता है कि समूह का हिस्सा बने रहने के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दो,अर्थव्यवस्था कहती है कि पैसे कमाने के लिए अपनी जिंदगी दाँव पर लगा दो, धर्म कहता है कि अपने-अपने भगवानों के नाम पर खुद को कुर्बान कर दो, सभ्यता कहती है कि अपनी अलग पहचान के लिए मरने मारने पर उतारू रहो, नैतिकता कहती है कि सत्य को बचाने के लिए अपना वजूद खत्म कर दो |
ये ही वो मकसद हैं,जो तुम इन्सानों के लिए तय किये गये हैं | तुमने अपनी नंगी आंखों से कभी किसी राष्ट्र, समाज, धर्म, सभ्यता,नैतिकता या अर्थव्यवस्था को न देखा है और न ही पूरी तरह से समझा है |
फिर भी तुमने इनके मकसदों को ओढ लिया और हजारों सालों से इन्हें पूरा करने के लिए खुद को मारते रहे, दूसरे इन्सानों को मारते रहे,दूसरे जीवों को मारते रहे, कुदरत को नुकसान पहुँचाते रहे |
मैं तुम्हारी इन हरकतो को वाजिब मान लेता,अगर तुम सारे इंसान इस पूरी कवायद के बाद खुद को एक देश, एक समाज, एक सभ्यता,एक धर्म, एक अर्थव्यवस्था या एक नैतिक मूल्य की छतरी के नीचे इकट्ठा कर पाते |
पर तुम्हारी जिन्दगी तो दिमागीतन्त्रों के अनगिनत मकसदों को पूरा करने की नाकाम कोशिशों में सिमट कर ही रह जाती हैं |
तुम मकसदों के लिए मर- मिट  तो सकते हो लेकिन तुम्हें मेरे और कुदरत के साथ सहज रूप से जिन्दा रहने में भारी दिक्कत होती है | तुम्हारे दिमाग में ये बात बिठा दी गयी है कि  इंसान बिना मकसद के नहीं जी सकते और तुम मकसद की जिन्दगी जीते हुए खुद को और अपने आसपास की सभी चीजों को बर्बाद करने पर तुल गये | मेरे और कुदरत के साथ जीने के लिए तुम्हें बस एक मकसद की जरूरत थी और वो मकसद था - सभी जीव-पदार्थो के साथ तालमेल बनाना और उस साहचर्य को महसूस करते रहना | तुम्हारे अलावा सारे जीवों ने इसी मकसद को जिया है और जीते रहेंगे लेकिन तुम इन्सानों ने अपनी जिन्दगी के इस बुनियादी मकसद को हाशिए पर डाल दिया |

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