गाँधी को किसने मारा ?
गाँधी को किसने मारा ?
इस प्रश्न को उस अर्थ में न लिया जाए, जिस अर्थ में अक़्सर लिया जाता रहा है। मैं दैहिक हत्या की बात नहीं कर रहा, मैं नश्वर शरीर के मिट जाने की बात नहीं कर रहा । वो तो मिटना ही था, उस दिन नहीं तो किसी और दिन, सभी गए हैं, सभी जाएंगे । गॉडसे तो निमित्त मात्र था ।
हम बड़ी भूल कर रहे हैं, दैहिक नश्वरता को मृत्यु मान बैठे हैं, यदि ऐसा होता तो प्रत्येक शरीर की बड़ी चर्चाएं होती जैसी विद्वानों के जाने की होती हैं परन्तु ऐसा नहीं है।
तो मरता कौन है, मृत्यु किसकी होती है, मारता कौन है ?
शरीर के चले जाने के बाद क्या बच जाता है, जो सदैव जीवित रहता है, मैं यहाँ आध्यात्मिक नहीं हो रहा हूँ एकदम यथार्थ । कोई आत्मा की बात नहीं करता, जीवित रहने वाली उस चीज का नाम, जो अविनाशी है वो हैं उस शरीर के मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाले विचार । मैं यह कह दूं कि मैं राम हूँ तो कदाचित् न चलेगा, इसलिए नहीं कि मैंने शरीर धारण नहीं किया हुआ, वो तो है, न हो तो उन जैसी कद काठी न होगी, शक्ल न होगी, रूप न होगा, सौंदर्य न होगा बल्कि इसलिए कि राम के मस्तिष्क में उत्पन्न विचार इस धरा पर सर्वश्रेष्ठ थे, कृष्ण, बुद्ध और न जाने कितने ही नाम यूँही नहीं लिए जाते हैं । वैचारिक चर्चाओं के तौर पर ये आज भी उपस्थित हैं, शरीर नहीं हैं उनकी चर्चाएं शेष हैं।
गोडसे गाँधी के शरीर को ही मार पाए उनके विचार को नहीं परन्तु वैचारिक हत्या के लिए बहुत जतन करने पड़ते हैं। कभी कभी व्यक्ति के विचार को मारने में इतना समय बीत जाता है जितनी उस इंसान की उम्र भी न रही होगी । पशुओं के कोई विचार नहीं होते, कीड़ों के कोई विचार नहीं होते, ठीक इनकी ही भांति अधिकांश लोग पाश्विक विचार के साथ जन्म लेते हैं और अपने शरीर के साथ ही उन विचारों का भी अंत हो जाता है परन्तु व्यक्ति के विचार वर्षों में, महापुरुषों के विचार सदियों और दिव्य पुरुषों के विचार युगों-युगों में ही नष्ट हो पाते हैं, मर पाते हैं।
गाँधी का शरीर तो कब का चला गया, मोहनदास करमचंद गांधी अब महात्मा हो गए। खूब फैलाव पाया उनके विचारों ने, देश-विदेश दीवाने हुए चले उस नाम के पीछे परन्तु वे उस व्यवहार को नहीं पकड़ पाए जो बापू का था । केवल नाम का गुणगान करने भर से देश कुछ भी मिलना न था और वही हुआ भी । चर्चाएं बहुत चलती रहीं परन्तु उनकी जीवन शैली, व्यवहार, विचार यथार्थ में उपयोग न हुए और यही गुणगान धीरे-धीरे उनकी वैचारिक हत्या करने लगा और आज लगभग गाँधी मारे जा चुके हैं , थोड़ा थोड़ा हम सबने गाँधी को मारा है ।
गोडसे ने केवल शरीर मारा और हमने ----- ????
- विमल 'अहसास'
इस प्रश्न को उस अर्थ में न लिया जाए, जिस अर्थ में अक़्सर लिया जाता रहा है। मैं दैहिक हत्या की बात नहीं कर रहा, मैं नश्वर शरीर के मिट जाने की बात नहीं कर रहा । वो तो मिटना ही था, उस दिन नहीं तो किसी और दिन, सभी गए हैं, सभी जाएंगे । गॉडसे तो निमित्त मात्र था ।
हम बड़ी भूल कर रहे हैं, दैहिक नश्वरता को मृत्यु मान बैठे हैं, यदि ऐसा होता तो प्रत्येक शरीर की बड़ी चर्चाएं होती जैसी विद्वानों के जाने की होती हैं परन्तु ऐसा नहीं है।
तो मरता कौन है, मृत्यु किसकी होती है, मारता कौन है ?
शरीर के चले जाने के बाद क्या बच जाता है, जो सदैव जीवित रहता है, मैं यहाँ आध्यात्मिक नहीं हो रहा हूँ एकदम यथार्थ । कोई आत्मा की बात नहीं करता, जीवित रहने वाली उस चीज का नाम, जो अविनाशी है वो हैं उस शरीर के मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाले विचार । मैं यह कह दूं कि मैं राम हूँ तो कदाचित् न चलेगा, इसलिए नहीं कि मैंने शरीर धारण नहीं किया हुआ, वो तो है, न हो तो उन जैसी कद काठी न होगी, शक्ल न होगी, रूप न होगा, सौंदर्य न होगा बल्कि इसलिए कि राम के मस्तिष्क में उत्पन्न विचार इस धरा पर सर्वश्रेष्ठ थे, कृष्ण, बुद्ध और न जाने कितने ही नाम यूँही नहीं लिए जाते हैं । वैचारिक चर्चाओं के तौर पर ये आज भी उपस्थित हैं, शरीर नहीं हैं उनकी चर्चाएं शेष हैं।
गोडसे गाँधी के शरीर को ही मार पाए उनके विचार को नहीं परन्तु वैचारिक हत्या के लिए बहुत जतन करने पड़ते हैं। कभी कभी व्यक्ति के विचार को मारने में इतना समय बीत जाता है जितनी उस इंसान की उम्र भी न रही होगी । पशुओं के कोई विचार नहीं होते, कीड़ों के कोई विचार नहीं होते, ठीक इनकी ही भांति अधिकांश लोग पाश्विक विचार के साथ जन्म लेते हैं और अपने शरीर के साथ ही उन विचारों का भी अंत हो जाता है परन्तु व्यक्ति के विचार वर्षों में, महापुरुषों के विचार सदियों और दिव्य पुरुषों के विचार युगों-युगों में ही नष्ट हो पाते हैं, मर पाते हैं।
गाँधी का शरीर तो कब का चला गया, मोहनदास करमचंद गांधी अब महात्मा हो गए। खूब फैलाव पाया उनके विचारों ने, देश-विदेश दीवाने हुए चले उस नाम के पीछे परन्तु वे उस व्यवहार को नहीं पकड़ पाए जो बापू का था । केवल नाम का गुणगान करने भर से देश कुछ भी मिलना न था और वही हुआ भी । चर्चाएं बहुत चलती रहीं परन्तु उनकी जीवन शैली, व्यवहार, विचार यथार्थ में उपयोग न हुए और यही गुणगान धीरे-धीरे उनकी वैचारिक हत्या करने लगा और आज लगभग गाँधी मारे जा चुके हैं , थोड़ा थोड़ा हम सबने गाँधी को मारा है ।
गोडसे ने केवल शरीर मारा और हमने ----- ????
- विमल 'अहसास'
Comments
Post a Comment