● अहंकार विसर्जन है भक्ति ●
प्रेम का मार्ग मस्ती का मार्ग है। होश का नहीं, बेहोशी का। खुदी का नहीं, बेखुदी का। जागरूकता का नहीं, तन्मयता का। यद्यपि प्रेम की जो बेहोशी है उसके अन्तरगृह में होश का दीया जलता है। लेकिन उस होश के दीए के लिए कोई आयोजन नहीं करना होता। वह तो प्रेम का सहज प्रकाश है, आयोजन नहीं।
यद्यपि प्रेम के मार्ग पर जो बेखुदी है, उसमें खुदी तो नहीं होती, पर खुदा जरूर होता है। छोटा मैं तो मर जाता है, विराट मैं पैदा होता है। और जिसके जीवन में विराट मैं पैदा हो जाए, वह छोटे को पकड़े क्यों ? वह छुद्र का सहारा क्यों ले ? जो परमात्मा में डूबने का मजा ले ले, वह अहंकार के तिनकों को पकड़े क्यों, बचने की चेष्टा क्यों करे ? अहंकार बचने की चेष्टा का नाम है। निर - अहंकार अपने को खो देने की कला है।
भक्ति विसर्जन है, खोने की कला है। और खूब मस्ती आती है भक्ति से। जितना मिटता है भक्त, उतनी ही प्याली भरती है। जितना भक्त खाली होता है, उतना ही भगवान से भरपूर होने लगता है। भक्त खोकर कुछ खोता नहीं, भक्त खोकर पाता है। अभागे तो वे हैं जिन्हें भक्ति का स्वाद न लगा, क्योंकि वे कमा - कमाकर केवल खोते हैं, पाते कुछ भी नहीं। भक्त अपने को गँवाकर अपने को पा लेता है। और हम अपने को बचाते - बचाते ही एक दिन मौत के मुँह में समा जाते हैं।
~ ओशो ~
Comments
Post a Comment