हस्ती

युगों बीते अल्लाह-राम
समझने समझाने में ।
मजहब की ये दीवारें,
अब तो ढह जाने दो ।।

धन-दौलत, घर-परिवार,
जाति-धर्म का रोना हुआ बहुत ।
दो कतरे अब,
देश पर बह जाने दो ।।

मिट गए ताज-औ-तख़्त,
दुनिया झुकाने में ।
ये ख्वाब अब,
दिल ही में रह जाने दो ।।

अपनी हस्ती से वाकिफ 'एहसास'
क्या बदले दिल-औ-दिमाग किसी के ।
अपनी बात तो मगर,
आज कह जाने दो ।।

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