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फेसबुक पर किसी भी टिपण्णी का सुखद पहलु ये है कि इस पर हुई बहस या तर्क एक तथ्य के रूप में दस्तावेज बन कर रहेंगे इसमें आपको ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती ।
इसी को ध्यान में रखकर मैं आज यह विचार आप सबके समक्ष रख रहा हूँ कि हमारे देश में नेताओं से कहीं ज्यादा अफसरशाही भ्रष्ट है, देशद्रोही है, मौकापरस्त है । वह एक चालाक लोमड़ी है जो कौवे को कहती है आप बहुत अच्छा बोलते हो और मुर्ख (नेता) उसकी चाल में आकर काँव-काँव करता है और रोटी (सत्ता) फिसलकर उसके या उसके इशारों पर किसी अन्य के पास चली जाती है ।
वर्तमान में प्रकाशित दो किताबों के लेखक पूर्व सरकार के नौकरशाह रहे हैं, मैं भली प्रकार से उनके बारे में कुछ भी नहीं जानता परन्तु इतना कह सकता हूँ कि वे निश्चित रूप से राष्ट्रद्रोही हैं ।
ये अपने आप में बहुत संगीन बात है मगर इस आरोप के पक्ष में मैं यही कहूँगा कि आज इनको नैतिकता क़ी याद क्यों आई ? केवल सुर्खियाँ बटोरने के लिए अथवा आने वाली सत्ता में मलाई खाने के लिए या फिर अगले किसी भी चुनाव में भाजपा का टिकट पाने के लिए या फिर जो भी बगुला विचार इनके दिमाग में चल रहा हो ।
भाइयों, ये अफसर (कुत्ते) उस समय किस बंधन में थे जब अमर्यादित घटनाएं इनके सामने घट रहीं थी । क्या कोई बेटा, भाई अपनी माँ या बहिन की इज्जत तार-तार हो जाने के ऊपर और अपनी लाचारी के विषय पर पुस्तक का विमोचन करवाएगा । यह निश्चित तौर पर सड्यंत्र हैं ।
आज भाजपा को ये बातें, पुस्तकें बहुत अच्छी लग रही हैं मगर वक़्त कहीं रुकता नहीं हैं । इस देश ने न जाने कैसे-कैसे आन्दोलन पनपते और धूल-धुसरित होते देखे हैं यह भी दौर गुजरते देर नहीं लगेगी यदि ऐसे लोमड, गिद्ध, बगुलों से सावधान न रहा गया तो ।
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