लोकतंत्र

जब से राजनैतिक समझ पैदा हुई है मुझे यह साफ़ तौर पर नजर आने लगा है कि जिस प्रकार का राजनैतिक परिवेश हमारे देश का है उसमें कहने को तो आप एक स्वतंत्र देश के नागरिक हो और आपको भी चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने की उतनी ही आजादी है जितनी कि देश के बड़े से बड़े नेता को परन्तु यथार्थ में स्थितियां भिन्न हैं ।
प्रथम तो इस देश में सत्ता संचालन में योग्यता के कोई भी मानदंड स्थापित नहीं किये गए हैं, एक व्यक्ति जिसने क्षेत्र का नाम भी न सुना हो उसकी समस्याओं से अवगत होना तो दूर । ऐसे व्यक्तियों को राजनैतिक दल प्रत्यासी के रूप में उतार दें क्या ये तर्क संगत लगता है ?
इन राजनैतिक दलों में लोकतान्त्रिक मूल्यों का नितांत अभाव है इससे अछूता कोई भी दल नहीं है । दल के शीर्ष नेता तानाशाही प्रवृति का आचरण करते हैं, प्रत्यासी चयन, पदभार वितरण, मंत्रालय वितरण में
योग्यता कम और निजी राजनैतिक समीकरण अधिक लगाये जाते हैं जिससे अयोग्य लोग शीर्ष पद पर बैठ जाते हैं इसके सीधे-सीधे दो नुक्सान देश को होते हैं, पहला यह कि इस मंत्रालय का अधिक योग्यता प्राप्त नौकरशाह हतोत्साहित होता है या फिर वह सर्वेसर्वा ही बन बैठता है, संतुलन की कोई स्थिति नहीं रहती ।
दूसरा ये अधिक योग्य और काबिल लोग पैसे, चमचागिरी के अभाव में मूह ताकते रह जाते हैं और शिक्षा से उत्पन्न विचारों, सिद्धांतो के चलते वे पद की लालसा भी नहीं रखते मगर देश को इनके अनुभव और समर्पण भाव का कोई लाभ नहीं मिल पाता ।
सचमुच ये विडंबना है कि एक दल केवल इस लिए चुनना मजबूरी बन जाता है क्योंकि दुसरे दल का कार्यकाल सफल नहीं रहा और इसका फायदा विरोधी दल टिकट वितरण में हूनर वाले नेताओं का दमन कर उठाते हैं, साथ ही साथ टिकटों की खुली बोलियाँ लगती हैं जैसे किसी निजी कंपनी की एजेंसी बांटी जा रही हो । सचमुच इतने बजट की टिकटें कोई इस लिए तो नहीं खरीदेगा कि उसकी समाज, देश सुधार में कोई रुचि है ।
इतनी बड़ी रकम सूद सहित कमाने में ही उसका कार्यकाल निपट जाना है, सोचें देश को, समाज को, जनता को क्या हाथ आना है ।
इन सारी विसंगतियों के मध्य एक और बात ये कि यदि मैं किसी दल या यूं कहें दल-दल का हिस्सा हूँ तो इसका एक सुखद पहलू ये हो सकता है कि मुझे कार्यकर्ताओं (जिनका हित मुझसे साधता हो) की एक फ़ौज मिल सकती है, दुखद ये कि ऐसा नहीं है एक क्षेत्र विशेष का मैं ही दावेदार हूँ अन्य भी होते हैं तो वो आपका विरोध करेंगे यदि ये पक्ष मजबूत हैं तो आपके सामने प्रतिद्वंदी के तौर पर मिलेगा अन्यथा भीतरघात करेगा यही मानव प्रवृति है और ये अपने आप में सही भी है ।
सिद्धांतों का दंभ भरने वाले या तो अपने-आप में बहुत कमजोर होते हैं या फिर इस इंतज़ार में रहते हैं कि कभी तो परिस्थितियां उसके अनुकूल होंगी ही । ये स्थितियां तो चुनाव विशेष के लिए है इसके अलावा जब आप दल रुपी खूंटे से बंधे होते हो तो पास में घटित होने वाली किसी भी घटना का विरोध या समर्थन अपनी आत्मा से नहीं करते इसमें आपकी दलगत नीतियां आड़े आती हैं । चाहते हुए भी किसी सम्प्रदाय विशेष की सही बात का समर्थन न करना और न चाहते हुए भी उसी की गलत बात का विरोध नहीं कर सकते ।
अन्ततोगत्वा आप अपने विचारों को समेटना शुरू करते हो कूटनीति बनाते हो अन्य समीकरण बैठते हो और देश फिर कहीं पीछे छूट जाता है ।

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