खुदगर्ज

तमन्नाओं की भीड़ में,
कितना खुदगर्ज बन गया मैं खुदा ।

एक आरजू करके पूरी, सुलाता तू मुझे ।
दर पर सुबह फिर आ गया मैं खुदा ।।

हर सजदे में दुआ मांगता हूँ,
उनके लिए जो कभी मेरे न होंगे,
वतन उनकी फ़िक्र में भुला आया मैं खुदा ।।

राम था वो रहीम था मगर था वतन के लिए,
कुर्सी के फेर में करवा आया मैं जुदा ।।

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