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फ़साना

ख़ामोशी से ये फ़साना कह गए, फिर न आने का बहाना कह गए !

चश्मा

बाजार से चन्द खुशियाँ ... खरीद लाया हूँ, प्लास्टिक की शक्ल में हैं कुछ, कुछ सोने की सूरत में हैं । बीवी खुश है, बच्चे खुश तो मैं भी खुश क्यूं न हूँ ? एक चश्मा ले आया हूँ, कुछ दवाएं भी । अब और टुकडे बटोरूंगा, कागज़ के .. ये टुकड़े सबको खुशियाँ बांटते हैं ।। माँ-बाप ने कुछ नहीं माँगा, उनसे भी कुछ पूछा मैंने, कांपते हाथ, बस यही कह रहे थे, बेटा हमें बस तुम्हारी ख़ुशी चाहिए ! ह ह ह !!! वो तो मैं चश्मा ले ही आया हूँ आधुनिकता का  !!!

वतन पर मरने वालों

उरूजे कामयाबी पर कभी हिन्दोस्ताँ होगा । रिहा सैयाद के हाथों से अपना आशियाँ होगा ।। चखाएँगे मज़ा बर्बादिए गुलशन का गुलचीं को, बहार आ जाएगी उस दम जब अपना बाग़बाँ होगा ।। ये आए दिन की छेड़ अच्छी नहीं ऐ ख़ंजरे क़ातिल पता कब फ़ैसला उनके हमारे दरमियाँ होगा ।। जुदा मत हो मेरे पहलू से ऐ दर्दे वतन हरगिज़, न जाने बाद मुर्दन मैं कहाँ औ तू कहाँ होगा ।। वतन की आबरू का पास देखें कौन करता है, सुना है आज मक़तल में हमारा इम्तिहाँ होगा ।। शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले । वतन पर मरनेवालों का यही बाक़ी निशाँ होगा ।। कभी वह दिन भी आएगा जब अपना राज देखेंगे । जब अपनी ही ज़मीं होगी और अपना आसमाँ होगा ।।  - अभिनव भारत अभियान

ज़ोर

गले की मालिश तबसे जोरों पर है ! जब से सुना, हमारा नाम उनकी उँगलियों के पेरवों पर है !!

स्वरूचि भोज

कोरे कागज़ पर, फकत रोटी ही लिख दो ! मगर कतारों में, 'स्वरुचि भोज' बक्श दो !

आशिक

जिंदगी दो होती, एक तुझ पे लुटा देता ! एक तो गुजर जाएगी महज, रोटी के बंदोबस्त में !! - बेरोजगार आशिक '1998'

Insaan

कितनी स्याही उड़ेल दी कागजों पर, मगर कुछ न बदला .... इंसान तू शैतान ही बनते चला गया ।। तिनका-तिनका बिखेरता घोंसले का, हैसियतों के तू , ये क्या ख्वाब बुनते चला गया ।। कुदरत की ताक़त क...